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FAZAL AHMAD KARIM FAZLI

06 Jul

Ek khoobsoorat ghazal. Fazal Ahmad Karim Fazli 

(With thanks from NAQOOSH, Lahore,August 1969)

ज़हरे ग़म खा के भी अच्छा तो हूं , और क्या चाहिए हँसता तो हूं

दिले दुश्मन में खटकता तो हूँ , कुछ न होने पे भी इतना तो हूँ

क्या करूँ आह जो मुंह से निकले , वैसे खामोश मैं रहता तो हूँ

क्या ज़रूरत मुझे वीराने की, बज़मे यारां में भी तनहा तो हूँ

तुम अगर मेरे नहीं हो, न सही ,मैं बहर हाल तुम्हारा तो हूँ

जाने वहशत के मुहब्बत है मुझे , खोया खोया हुआ रहता तो हूँ

देखिये देखिये कब आते हैं, आने वाले हैं, यह सुनता तो हूँ

आप को खेल तमाशे हैं पसंद , मैं भी एक खेल तमाशा तो हूँ

आप देखें न तो क्या इसका इलाज ,वैसे मैं बज़्म में बैठा तो हूँ

हाले ज़ार उनसे कहूँ क्या फ़ज़ली , वोह समझते हैं मैं अच्छा तो हूँ

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2 Comments

Posted by on July 6, 2011 in Urdu Poetry

 

2 responses to “FAZAL AHMAD KARIM FAZLI

  1. Mazhar Masood

    July 7, 2011 at 12:41 am

    Delkhiye Delkhiye kab aatay hain , Aanay waalay hain ,ye sunta to hoon.

    Bahut khoob.

     
  2. shakilakhtar

    July 7, 2011 at 12:49 am

    Ghar meiN boria har waqt rakkheN. Un ka kya pata ke kab aa jayeN.
    Shukria Mazhar bhai. Mujhe is gazal ki sadgi pasand aayi thi.

     

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